Showing posts with label Health. Show all posts
Showing posts with label Health. Show all posts

Thursday, November 7, 2019

जनसंख्या - भारत की बढ़ती आबादी

See the source image

जनसँख्या ,यह शब्द सुनते ही आँखों के सामने चलते फिरते करोड़ो लोगों की भीड़ की तस्वीर सामने आ जाती है खासकर भारत में ,क्योकि हम लोग भारत में रहते हैं तो तस्वीर भी भारत की ही दिखाई देगी। इन दिनों भारत में बढ़ती हुई जनसख्याँ को लेकर बहुत सारे बुद्धिजीवियों। राजनेताओं ,पत्रकारों और आम नागरिकों के वक्तव्य आ रहे हैं ,क्योंकि देश के हालात ही कुछ ऐसे हैं। किसी भी देश की सरकार का ये पहला कर्तव्य होता है की वो अपने नागरिकों की प्राथमिक जरूरतों के साथ -साथ उनके सम्पूर्ण विकास और उत्थान के लिए सर्वोपरि कदम उठाये। किन्तु जनसँख्या की दृस्टि से भारत आज विश्व में पहले नम्बर पर आने से सिर्फ दो कदम दूर है तो इन परिस्तिथियों में सीमित संसाधनों के साथ ये कैसे संभव है की सभी की जरूरतें पूरी हो जाये तो कौन से कदम उठाये जाये की इस बढ़ती हुई आबादी पर रोक लग सके। 


जनसख्याँ के आँकड़े 

अब से ५० साल पहले दुनिया की आबादी ३ अरब ५५ करोड़ थी और आज ये आँकड़ा ७ अरब ७ करोड़ है आज भारत की जनसँख्या लगभग १ अरब ३७  करोड़ है और चीन की आबादी १ अरब ३९ करोड़ है। १२ साल बाद हम चीन से ८%ज्यादा होंगे। २०५० में हमारी जनसँख्या २५%ज्यादा हो जाएगी। इस समय देश में १५ साल से कम उम्र की आबादी २८ %है। ये आँकड़े PRB {population Refration Bueroau}की वर्ल्ड रिपोर्ट से लिए गए हैं।भारत के पास विश्व के पानी का ४%है तथा भूमि का २. ४%है ,परन्तु भारत की आबादी विश्व की १७. ९९%है। तो इसी से अंदाज लगाया जा सकता है की स्तिथि कितनी चिंताजनक है। 

See the source image
 फैमिली प्लानिंग पॉलिसी

हिन्दुस्तान उन देशों में शामिल है जिन्होंने सबसे पहले फैमिली प्लानिंग पॉलिसी बनाई ,परन्तु आज ऐसे हालात हैं कि हम सोचने पर मजबूर हैं कि कौन -कौन से कारण रहे की हम जनसँख्या कंट्रोल नहीं कर पाए। इसी चिंता के मद्देनजर मध्य प्रदेश के सांसद उदय प्रताप सिंह ,{होंसंगाबाद }ने एक एन जी ओ के साथ एक रिपोर्ट तैयार की है और उसे १२५ सांसदों के साथ राष्ट्रपति को सौंपा है। उदय प्रतापसिंह ने इस मुद्दे को संसद में भी बड़ी गंभीरता के साथ उठाया है। उनके इस ड्राफ्ट के अनुसार सब्सिडी हटाना ,सरकारी नौकरी न देना ,वोट का अधिकार छीन लेना जैसे कुछ उपाय सुझाये गये हैं।

 See the source image

बढ़ती आबादी से नुकसान 

जनसख्याँ कितनी बड़ी समस्या है इसका अंदाजा इस बात से लगाइये की संसाधन ख़त्म होते जा रहे हैं बेरोजगारी बढ़ती जा रही है पर्यावरण को कितना नुकसान हो रहा है इसका नतीजा हमारी नदियों की हालत देखकर ,स्वास्थ्य सेवाओं में मारामारी ,एक पद पर १० हजार आवेदन,सड़को पर ट्रैफिक जाम की हालत देखकर लगाया जा सकता है। देश में ९.७ %लोगों को पानी नहीं मिल रहा है।प्रदूषण बढ़ता जा रहा है ,देश के अंदर अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। 

 

विवादास्पद बयान 

जनसंख्या दिवस के मौके पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने एक विवादास्पद बयान दिया कि "१९४७ की तरह भारत सांस्कृतिक विभाजन की तरफ बढ़ रहा है ,सांस्कृतिक समरसता और संतुलन बिगड़ रहा है।" जिस पर खूब राजनीति हुई। ऐसा ही बयान कुछ वक्त पहले कि हिन्दुओं को १० -१० बच्चे पैदा करने चाहिए क्योकि हिन्दुओं की जनसँख्या लगातार कम हो रही है परन्तु नेताओं को ऐसे बयानबाजी से बचना चाहिए इसी तरह ओवैसी और आजम खान जैसे मुस्लिम नेता भी ऊट -पटांग गैरजिम्मेदाराना बयान जारी करते रहते हैं। 

 

धर्म की आड़ में जनसँख्या को बढ़ावा 

जनसँख्या को लेकर हिन्दू -मुस्लिम की राजनीति शुरू हो जाती है क्योकि मुस्लिम इसे अल्लाह की देन कहकर बच्चों की संख्या को सीमित नहीं करना चाहते लेकिन जनसंख्या नियन्त्रण के लिए ये कदम उठाना बहुत ही जरूरी है जनसँख्या नियंत्रण के लिए लोगों का पढ़ा -लिखा होना जरूरी है ,इससे वे यह बात अच्छी तरह समझ पाएंगे कि उनके विकास और तरक्की के लिए बच्चों का सीमित संख्या में होना कितना जरूरी है जनसँख्या नियंत्रण बहुत जरूरी है क्योंकि ये देश शरीयत से नहीं सविधान से चलेगा। 

सख्त कानून की दरकार 

सरकार को जनसँख्या नियंत्रण के लिए एक सख्त कानून लाना चाहिए जिससे की इस तेज रफ़्तार से बढ़ती आबादी पर रोक लगायी जा सके। और देश के अंदर इसे समान रूप से लागू करना चाहिए। इसमें किसी भी जाति और धर्म को रत्ती भर भी छूट की कोई गुंजाईस नहीं है क्योंकि सविधान के तहत नागरिकों पर समान नियम और कानून लागू होते हैं। वैसे तो इसमें पढ़े -लिखे और समझदार लोग खुद ही सहयोग करेंगे परन्तु यदि कोई ये नियम न माने तो उनके ऊपर कठोर कार्यवाही और सजा का इंतजाम किया जाय -जैसे जो भी दो {२ }बच्चों से ज्यादा पैदा करे उनकी सभी सरकारी सुविधाएं जैसे सब्सिडी ,पेंशन आगे चलकर ,सरकारी नौकरी ,बिजलीपानी के डबल बिल वोट का अधिकार आदि न देना। 

 

पडोसी से सीख

भारत को इस मामले में अपने पड़ोसी बांग्लादेश से सबक लेना चाहिए कि कितनी समझदारी से उसने अपनी बढ़ती आबादी को नियंत्रित किया है। इस क्षेत्र में बांग्लादेश हमसे बहुत आगे है बांग्लादेश ने सिर्फ कानून बनाकर ही ये उपलब्धि हासिल नहीं की बल्कि उससे पहले जागरूकता अभियान चलाये ,गाँव -गाँव लोगों को समझाया ,अपनी नई पीढ़ी को परिवार नियोजन के साधन उपलब्ध कराये ,शिक्षा और स्वास्थ्य पर जोर दिया। भारत भी ये सभी नियम अपनाकर अपनी बढ़ती आबादी को नियंत्रित कर सकता है। यहॉँ एक विशेष ध्यान देने वाली बात यह है की बांग्लादेश एक मुस्लिम राष्ट्र है लेकिन फिर भी लोगों ने अपनी और अपने देश के बेहतर विकास और अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए सरकार का पूरा सहयोग किया है। 

 कदम जो उठाने होंगे 

देश के ११ राज्यों में हम दो हमारे दो का नियम पहले में से ही लागू है और अभी हाल ही में असम सरकार ने जनसंख्या को लेकर एक कानून पारित किया है की जो भी अगले साल से दो बच्चों से ज्यादा पैदा करेगा उसकी सारी सरकारी सुविधाएं छीन ली जाएँगी ऐसा करने वाला असम देश का पहला राज्य बन गया है।लोगों को अपनी वर्तमान पीढ़ी को विवाह के तुरन्त बाद कुछ इस तरह की बातें कि "खुशखबरी कब सुना रहे हो "'कहने से भी बचना होगा। या फिर लड़के के बाद लड़की या लड़की के बाद लड़का ,एक और बच्चा के जन्म की सलाह देने से भी बचना होगा,क्योंकि हमारे देश में परिवारों पर कुछ इस तरह के सामाजिक दबाब भी जनसँख्या वृद्धि में सहायक हैं।  

जनसँख्या वृदि की वजह से आज देश में पर्यावरण प्रदूषण ,ग्लोवल वार्मिंग आर्थिक और सामाजिक शोषण ,गरीबी अपराध ,लोगों की हिंसक प्रवत्ति ,अवसाद ग्रस्त होना ,आतंकवादी बनना आदि सभी समस्याओं की जड़ जनसँख्या वृद्धि है। इसी वजह से देश अपना बहतर तरीके से विकास नहीं कर  पाता ,हमे अपने संसाधनों का ज्यादा मात्रा में उपयोग करना पड़ता है जिसके परिणामस्वरूप धीरे -धीरे हमारे उपलब्ध संसाधन समाप्त होते चले जायेंगे ,तो क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को यहाँ एक अंधकारमय भविष्य देकर जायेंगे ऐसे में अगर भारत को एक शक्तिशाली और विकसित राष्ट्र बनना है तो जनसँख्या पर सख्ती से लगाम लगानी ही पड़ेगी। । 

(यह लेखिका के अपने विचार है) 

 
 

  

 

Friday, October 18, 2019

दिल्ली की जानलेवा प्रदूषित आवोहवा

पर्यावरण प्रदूषण निवारक प्राधिकरण [इपका ]ने मंगलवार को दिल्ली -एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान यानि [गैप ]लागू कर दिया। दिल्ली सरकार ने पहले ही तीनो निगम ,डीडीए जैसे तमाम विभागों को पहले से ही इसकी जानकारी दे दी गई थी। पर्यावरण प्रदूषण निवारक प्राधिकरण के प्रमुख भूरेलाल ने बताया ,एनसीआर में डीजल जेनरेटर ,बिना जिग जैग तकनीक वाले ईट भट्टों ,होटल रेस्टोरेंट में कोयला व लकड़ी के चूल्हों पर रोक लगेगी। 

 
 
 

हवा की  गुणवत्ता

अक्तूबर के महीने में हर साल हवा की गुणवत्ता का स्तर इतना नीचे गिर जाता है कि साँस लेना भी दूभर हो जाता है पिछले सालों की तरह इस साल भी पिछले एक हफ्ते से दिल्ली की आबोहवा बद से बदतर हो गयी है। केंद्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के मुताबिक मंगलवार को दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक २७० अंक पर रहा ,जो खराब श्रेणी का है। 'सफर "का अनुमान है {केंद्र द्वारा संचालित संस्था }की आने वाले समय में ये और भी भयानक रूप लेगी।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने मंगलवार को प्रदूषण का स्तर इतना नीचे गिर जाने पर अधिकारियों को आड़े हाथों लिया । परन्तु सवाल यह उठता है की जब सारे दिशा -निर्देश पहले ही जारी कर दिए गए थे तो समय रहते उन सभी गतिविधियों पर रोक क्यों नहीं लगायी गयी। पिछले ५ सालों में केजरीवाल सरकार आड -इवन का खेल ,खेल रही है कि इससे दिल्ली का प्रदूषण कम होगा परन्तु पिछले साल सुप्रीम कोर्ट तक ने कहा की,आड -इवन से प्रदूषण को कम करने में कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। 

 
 
प्रदुषण पर लापरहवाही 

 प्रदूषण की वजह से दिल्ली में लगातर साँस और दमा के मरीजों की संख्या वर्ष दर वर्ष बढ़ती जा रही है लोगों की सेहत पर खराब हवा के प्रभाव की तुलना एक दिन में १५ से २० सिगरेट पीने से की जा सकती है। लेकिन सरकार इसके लिए कोई कारगर कदम नहीं उठा पा रही है। दिल्ली में वायु की गुणवत्ता का खराब होने का ठीकरा सबसे ज्यादा पंजाब और हरियाणा से आने वाले पराली {फसल काटने के बाद जमीन में जो जड़े खड़ी रह जाती हैं }के धुएँ के ऊपर फोड़ दिया जाता है। लेकिन केंद्र द्वारा संचालित संस्था ''सफर ''के आँकड़ो के मुताबिक दिल्ली की आबोहवा को प्रदूषित करने में पराली का योगदान सिर्फ ५ फीसदी है। जिसका मतलब ये हुआ की ९० %कारण स्थानीय है जिनका हल स्वयं दिल्ली सरकार को ही निकालना होगा। 

 
 
प्रदुषण पर प्रतिक्रिया 

देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण का स्तर इस कदर बढ़ गया है की अब यह रहने लायक नहीं बची है यह विशेष टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरुण मिश्रा ने की उन्होंने कहा कि दिल्ली में जिस तरह के हालात हो गए हैं उससे यह तो साफ है कि यह शहर अब काम करने और रहने लायक नहीं बचा है। जस्टिस मिश्रा ने कहा कि मुझे शुरुआत में दिल्ली अच्छी लगी लेकिन अब ऐसा नहीं है। मै रिटायर होने के बाद दिल्ली में नहीं रहूँगा। दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण पर चिंतित हाईकोर्ट ने कहा ,लगता है जैसे गैस चैम्बर में रह रहे हैं। 

 
 
ठोस कदम उठाने की ज़रूरत 

दिल्ली सरकार को दिल्ली की आबोहवा को कुछ दुरुस्त कदम उठाने की जरूरत है सिर्फ उठाने की ही नहीं उन्हें क्रियान्वित  करने की भी। दिल्ली के प्रदूषण में अहम योगदान बाहरी राज्यों से आने वाले करीब ४५ लाख गाड़ियों जिसमे सामान पहुंचाने वाले ट्रकों का है, क्योंकि ज्यादातर गाड़ियाँ डीज़ल और पैट्रोल से चलती हैं इसलिए बाहर से आने वाले हैवी वाहनों पर रोक लगना बहुत जरूरी है क्योंकि दिल्ली में बाहर से आने वाले वाहनो में पंजाब ,हरियाणा उत्तरप्रदेश के वाहनों की काफी संख्या है । 

{२ }दिल्ली के प्रदूषण में दूसरा बड़ा योगदान दिल्ली के उद्योग और लैंडफिल साईट का है.इसमें अकेले भलस्वा ,गाजीपुर और ओखला के लैंडफिल साईट से निकलने वाला धुआँ ,उड़ता कूड़ा -कचरा और कचरे से बिजली बनाने वाले कारखाने का काफ़ी बड़ा योगदान है 

३ ]दिल्ली की आबोहवा को जहरीला बनाने में पड़ोसी राज्यों से आने वाले धूल और धुयें का भी काफी योगदान है। हर साल दिल्ली में पराली या भूसे के जलने के कारण दिल्ली वालों को प्रदूषित हवा में साँस लेनी पड़ती है ये नजारा दिल्ली में हर साल देखने को मिलता है जब खरीफ की फ़सलें काटी जाती हैं और अवशेषों को जलाया जाता है ।प्रदूषण का एक और कारण है राजस्थान से आने वाली धूल भरी हवाएँ। 

इन दोनों ही समस्याओं का सरकार चाहे तो समाधान निकाल सकती है। मैने सुना है कि मिडिल ईस्ट में फ़सलों के बचे हुए अवशेषों की मांग है किसान इससे कुछ एक्स्ट्रा इनकम भी कर पाएंगे लेकिन सरकार ने इस पर भी रोक लगाई हुई है कुछ  ऊटपटाँग नियम बनाये हुए हैं ऐसे में सरकार का फर्ज है कि किसानों को हर संभव मदद करे और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराये। सरकार और नेताओं ने मिलकर अरावली की की पहाडिओं को लगभग खत्म ही कर दिया है। वरना पहले राजस्थान से आने वाली धूल को अरावली की पहाड़ियाँ रोक लिया करती थीं। इसलिए अब सरकार को उस जगह पर ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए 

प्रदूषण का एक और सबसे बड़ा कारण है रिहाइशी इलाकों में लगातार चलने वाला कंस्ट्रक्शन कार्य और उस पर बरती जाने वाली लापरवाही। गली -मोहल्ले में सालों साल कहीं न कहीं भवन निर्माण व मैट्रो का कार्य ,सड़कों का निमार्ण आदि में खूब लापरवाही बरती जाती है सरकार को चाहिए की ऐसे अधिकारियों से जवाबदेही होनी चाहिए जिनके कार्यक्षेत्र में ये सब काम आते हैं 

पिछले ५ सालों में सड़कों की हालत बदतर हो चुकी है टूटी -फूटी और गड्ढो से भरी हुई सड़के पूरी दिल्ली में देखा जाना आम बात है निगमों में भाजपा और आम आदमी पार्टी दोनों की ही सरकार है परन्तु ऐसा लगता है की न तो किसी को दिल्ली की और न ही दिल्ली की आबोहवा की कोई फिक्र है ,बस सब अपने -अपने हित साधने में लगे हुए हैं। सबसे ज्यादा दुःख की बात तो ये है कि इस बार दिल्ली में केंद्र की भाजपा सरकार के सातों सीटों पर सांसद चुनकर आये हैं लेकिन फिर भी दिल्ली को उपेक्षा झेलनी पड़ रही है।

दीपावली के बाद

जैसा कि उम्मीद थी प्रदूषण का स्तर अपने सबसे उच्च स्तर वायु गुणवत्ता सूचकाँक ८०० -१००० ,३ नवम्बर २०१९ दिन रविवार ,पर पहुँच गया। दिल्ली के हालात इस वक्त बहुत खराब हैं ,धुआँ घरों के अंदर तक पहुँच गया है लोगों का दम घुट रहा है ,साँस लेने में तकलीफ हो रही है ।भीड़ भरे प्रदूषित चोराहों पर एयर प्यूरीफायर लगाने की पायलट परियोजना असफल हो गयी है ।  ऑड -इवन शुरू हो चुका है। कल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को फटकार लगाई है ,लेकिन नेता हैं कि नाटकबाजी करने से बाज नहीं आ रहे हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री तक ऑड -इवन के विरोध में आकर अपना चालान कटवा रहे हैं ,इस बात से ही आम आदमी समझ सकता है कि केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली के प्रदूषण को लेकर कितनी गम्भीर है।सरकारों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए क्योकि वे नागरिकों के जीने के अधिकार का हनन कर रही हैं.   

 
 
निष्कर्ष 

केजरीवाल सरकार को अब जब चुनाव जैसे -जैसे नजदीक आ रहे हैं तो सब कुछ फ्री में बाँटकर लोगों को बेवकूफ बनाकर अपना हित साधना चाहते हैं पिछले ५ सालों में केजरीवाल सरकार को कुछ भी याद नहीं आया किन्तु जब प्रदूषण का स्तर इतना गिर गया है तो अब अचानक सड़को पर छिड़काव करवाया जा रहा है ,ओड -इवन लागू किया जा रहा है कंस्ट्रक्शन कार्यों में नियमों का उललंघन करने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है कहीं -कहीं लोंगो को बहकाने के लिए सड़कें बनवायी जा रहीं हैं । पराली पर हायतौबा मचायी जा रही है। काश ,ये सारे कदम दिल्ली सरकार समय रहते उठाती तो शायद दिल्ली की और दिल्ली वालों की प्रदूषण की वजह से इतनी तकलीफें न उठानी पड़ती। और खासकर ऐसे मुख्यमंत्री ,जो खुद साँस की बीमारी से ग्रस्त हैंउनसे ऐसी उम्मीद न थी.  

{ये लेखक के अपने विचार हैं }         

Tuesday, October 8, 2019

स्वच्छ भारत ,सुखी भारत।

 

Swachh bharat

ये प्रधानमंत्री मोदी का और पूरे भारत का बहुत बड़ा सपना है। 'स्वच्छ भारत अभियान ' की शुरुआत २ अक्टूबर २०१४ को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की जयंती पर की गयी। महात्मा गाँधी की जयंती पर ही इस अभियान को इसलिए शुरू किया गया है क्योकि गाँधी जी ने ही सबसे पहले स्वच्छ भारत का सपना देखा था। इस अभियान को दो भागों में बाँटा गया है। एक स्वच्छ भारत अभियान ग्रामीण और दूसरा स्वच्छ भारत अभियान शहरी। इस अभियान का लोगो गांधीजी के चश्मे को बनाया गया है। और इस अभियान की एक टैग लाइन भी जारी की गयी है ,एक कदम स्वच्छता की ओर।

सन २०१९ में देश बापू की १५०वी जयंती मना रहा है और गांधीजी अपने चश्में से बने लोगो से हम सबको देख रहे हैं कि उनका स्वच्छ भारत का सपना कितना पूरा हुआ और कौन कितनी कोशिश कर रहा है भारत को स्वच्छ रखने की। हालांकि आजादी के बाद जितनी भी सरकारे आयी सभी ने अपने -अपने स्तर पर कुछ न कुछ कार्य किये हैं और सभी अभिनंदन के हकदार हैं लेकिन मोदी सरकार ने लोगों में सफाई के प्रति जनजागरण का काम किया है।   

इस अभियान के लक्ष्य को हासिल करने की कोशिश की गयी है खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। गाँवो में शौचालयों का हर घर में निर्माण कराया गया है। और गाँव के बाहर सार्वजनिक शौचालयों को बनवाने के लिए पैसे सीधे गाँव प्रधान के पास पहुँचाया गया है इस प्रावधान से भ्र्ष्टाचार की गुंजाइश भी न के बराबर रह गयी है। गाँव में शौचालयों के बनने से महिलाओं से सम्बन्धित बहुत बड़ी समस्या का समाधान हो गया है उनके स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ये विशेष महत्व रखता है। 

शहरों में भी सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण किया गया है। पहले के वक्त में लोग इधर -उधर परेशान होकर घूमते फिरते थे खासकर महिलाओं को घर से बाहर काफी परेशानिओं का सामना करना पड़ता था। लेकिन अब जगह -जगह सुलभ शौचालयों का निर्माण कराया गया है। लेकिन अभी भी शौचालयों की सफाई और पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। इसलिए अभी हमें इन समस्याओ के समाधानों पर भी ध्यान देना होगा जिससे लोगों के स्वास्थ्यय का ध्यान रखा जा सके। क्योकि स्वच्छ भारत का उद्देश्य ही स्वस्थ्य भारत है। 

 

हमारे देश में लोगो को गली -मोहल्लों को साफ रखने की आदतों में भी सुधार करना होगा। सड़कें बनाने का काम तो सरकार का है किन्तु उसे स्वच्छ रखने का कार्य तो हम सभी को मिलकर करना होगा। लोगों को गलियों में कूड़े ऐसे ही फ़ेंक देने की आदतों में सुधार लाना होगा गलियों में पान खाकर दीवारों पर थूकना बंद करना होगा और हमें सफाई के प्रति जागरूक होना होगा क्योकि ये काम जन सामान्य का काम है। गंदगी दूर कर देश सेवा करना हमारा कर्तव्य है।

ज्यादातर देखने में आता है कि जब भी हम कहीं बाहर घूमने किसी हिल स्टेशन या बीच पर जाते हैं तो खाने -पीने के सामान के रैपर बॉटल्स कप्स आदि ऐसे ही फ़ेंक देते हैं जिससे वहाँ की ख़ूबसूरती तो खराब होती ही है बल्कि उससे ज्यादा प्रकृति को कितना नुकसान पहुँचा रहे हैं इसका अंदाजा भी आप लोगों को उस वक्त नहीं लग पाता है। आप खूबसूरत जगह देखने जाते हो और उस जगह को गन्दा करके लौटते हो हो तो इस तरह तो पूरे भारत में कोई भी स्थान स्वच्छ बचेगा ही नहीं। हमें अपनी इन आदतों को भी छोड़ना होगा। 

 

कचरे के उपुयक्त प्रबंधन के लिए सरकार ने कई कदम उठाये हैं उसमे कचरे को तीन हिस्सों में बांटना शामिल है -१ बायोडीग्रेवाल २ घरेलू कचरा और ३ सूखा कचरा। जगह -जगह सार्वजनिक स्थानों पर डस्टबिन रखना ,प्लास्टिक की बोतल वगैरह अलग से इकट्ठा करना, कचरा बीनने वालों को पेमेंट करना शामिल है। लोगों में व्यवहारिक परिवर्तन लाने के प्रयास करना आदि। 

क्या सफाई सिर्फ सफाईकर्मियों का ही जिम्मा है हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं। हम सिर्फ इसे सफाई कर्मचारियों के भरोसे कैसे छोड़ सकते हैं। हमें अपनी आदतों में बदलाव लाना होगा बेशक पुरानी आदतों को छोड़ने में थोड़ा वक्त लगता है परन्तु अपनी भलाई के लिए और विश्व में अपने देश की स्वच्छ छवि बनाने के लिए हमें ऐसा अवश्य ही करना होगा। हम सभी भारतीयों को सफाई को एक नियम नहीं बल्कि अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लेना चाहिए जब हम बदलेंगे तभी तो देश बदलेगा।

[ये लेखक के अपने विचार हैं ]  

Saturday, August 31, 2019

फिट इंडिया अभियान

 
 
 

                    

''फिट रहेगा इंडिया तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया''  इन्हीं  पंक्तियों को सार्थक करते हुए कुछ दिनपहले 'मन की बात' कार्यक्रम में  प्रधानमंत्री मोदी ने 'फिट इंडिया अभियान' शुरू करने की बात कही थी इस अभियान का उद्देशेय लोगों को स्वास्थय  के प्रति जागरूक करना और उन्हे फिट बनाना भी है। इस अभियान की शरुआत २९ अगस्त को करना विशेष भी है। क्योकि आज के दिन ही खेल दिवस मनाया जाता है। और आज ही हॉकी के जादूगर और महान खिलाडी ध्यानचंद का जन्मदिन भी है। 

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रीय खेल दिवस के मौके पर आज यहां देहली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में फिट इंडिया अभियान का आगाज किया। सरकार इस अभियान को स्वच्छता अभियान की तरह पूरे जोर शोर से चलाएगी। फिट अभियान के जरिए हेल्दी इंडिया की दिशा में एक कदम बढ़ा दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इंडिया में प्रत्येक नागरिक को फिट करना सरकार का लक्ष्य है। 

फिट इंडिया अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार ने करीब आधा दर्जन मंत्रालयों खेल मंत्रालय ,मानव संसाधन विकास मंत्रालय। ग्रामीण विकास मंत्रालय आदि को एक साथ तालमेल बनाकर काम करने को कहा गया है। इस कार्यक्रम का मतलब खुद को फिट रखना और देश को फिट बनाना है। इस अभियान में बच्चे ,बड़े ,युवा और बुजुर्ग सभी की सेहत को ठीक रखने का लक्ष्य रखा गया है। 

इस अभियान को सफल बनाने के लिए कार्यक्रम में खेल जगत, उद्योग जगत , फिल्म जगत के कई बड़े सितारों ने भी अपनी उपस्तिथि दर्ज कराई। फिट इंडिया अभियान को बनाने के लिए सोशल मीडिया व् मोबाइल एप्प का सहारा भी लिया जाएगा। सभी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज से अपने खेल कार्यक्रम अपनी अपनी वेबसाइट पर डालने के लिए कहा गया है। यह अभियान ४ साल तक चलाया जाएगा और हर साल इसकी थीम अलग होगी। पहले साल लोगों को शारीरिक फिटनेस और जागरूक करने का काम, दूसरे साल खाने की आदतें, तीसरे साल पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली और ४थे साल रोगों से दूर रहने के तरीकों पर आधारित है । 

वैसे भी कहावत है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग काम करता है ।  पुराने समय में आश्रम व्यवस्था होती थी और बच्चों को पढाई करने के लिए गुरुकुल भेजा जाता था और वहां जीवन शैली के अंदर योग प्राणायाम, खेल  प्रतियोगिताएँ आदि  सब क्रियांए बड़े नियम और अनुशासन में रहकर सिखाया जाता था।  इससे बच्चे   प्रकृति प्रेमी भी बनते थे और प्रकृति के साथ रहना भी सीखते थे।  स्वस्थ रहने के लिए प्रकृति के साथ उठना, प्रकृति के साथ रहना और प्रकृति के साथ सोने की आदते भी आ जाती थीं।   हमारे स्वास्थय  पर हमारी जीवन शैली और खानपान का बहुत बड़ा असर होता है। इसी लिए हम सभी को मौसम के अनुसार अपना खानपान रखना चाहिए।  सुबह उठकर ३० मिनट  व्यायाम ज़रुर करना चाहिए।

एक सर्वे के मुताबिक ७० % युवा रोज़ व्यायाम नहीं करते, ६२.५ % अपने खानपान पर ध्यान नहीं देते , और देश में केवल १०% भारतीय कसरत करते हैं । जबकि सेहत पर सरकारी खर्च औसत ३ रूपये है, यह दुनिया में सबसे कम  है जोकि जीडीपी का १% है, हालाँकि लोगों में धीरे धीरे स्वास्थ्य  के प्रति जागरूकता बढ़ रही है।  फिट रहना व्यक्ति के लिए बहुत ही आवश्यक है क्यूंकि यदि व्यक्ति स्वस्थ नहीं रहेगा तो उसके जीवन की हर बात प्रवाभित होगी।  यदि व्यक्ति को बीमारी की वजह से अपनी कमाई का एक बड़ा हिंसा गवाना पड़े तो उसकी आर्थिक हालत भी अच्छी नहीं रहेगी और इन बातों  का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।  हम सभी स्वस्थ रह कर अपना और अपने देश का भला कर सकते हैं।  और अंत में मै यही कहना चाहूंगीकि   अभियान को सफल बनाने हेतु हमे इसकी शुरुवात अपने परिवार से ही करनी होगी।          

 धन्यावद (यह लेखक के अपने विचार हैं)        

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद पर फैसला आने के बाद की स्थिति

फैसले की उत्सुकता     चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने ९ नवम्बर २०१९ की सुबह लगभग १०:३० पर जब राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद पर पाँच जजों की ...